Yashendra

चैत्र नवरात्रि प्रथम दिन ( 27 मार्च 2009 )

बरसों बाद अकस्मात जा पहुँचा गोपालगंज के थावे शक्तिपीठ. कोई योजना नहीं थी. बस, अपने आप को पाया मैया के चरणों में, सपरिवार. ध्यान आया कि अरे, आज तो चैत्र नवरात्रि का प्रथम दिन है ! 27 मार्च 2009. अहा ! थावे का मेला भी मिलेगा देखने को ! .. वही मेला जहाँ अम्मा (नानी) की गोद में घूमता था कृष्ण भगवान् का नया कैलेंडर पाने के लिए. अम्मा या मम्मी खरीदतीं थीं बंगाल का सिन्दूर, और वही दुकान वाला देता था किसी देवी- देवता का एक नया कैलेंडर ! …. वैसे मै हमेशा ही जिद किया करता था और भी कैलेंडर खरीदने के लिए…….
वही थावे का मेला !! अहा ! ….. जहाँ जाने के लिए बंजारी रोड ( गोपालगंज) पर घर के गेट पर अम्मा का हाथ पकड़े खड़ा रहता था सिवान जाने वाली बस के इंतजार में. उस बचपन में लगता था न जाने कितनी दूर जाना है. अब तो 15 मिनट लगता है ! ….. सच है, बचपन के जाने पर भौतिक दूरियाँ कम होने लगतीं हैं ( …..और मन की दूरियाँ बढ़ने लगतीं हैं !!).
न जाने कितनी यादें जुड़ी हैं थावे के साथ. थावे शक्तिपीठ उत्तरी बिहार के गोपालगंज जिले में स्थित है. गोपालगंज शहर से मात्र 9 किमी की दूरी पर. मंदिर हथुआ राज के अंतर्गत आता है. शायद आज भी. एक ज़माने में मेरे बाबा ( गोपालगंज के नामी वकील श्री योगेन्द्र प्रसाद) हथुआ राज के वकील थे.
…. गोपालगंज स्टेशन के सामने एक गाँव है हरखुआँ जो मेरा ननिहाल है. (गोपालगंज स्टेशन का नाम पहले हरखुआँ ही हुआ करता था. 70 के दशक में यह परिवर्तन हुआ.) …. जहाँ तक मेरा अनुमान है यह ‘हरखुआँ’ गाँव का नाम उसी हरखु ( रहषु ) भगत के नाम पर पड़ा है जिनकी भक्ति से थावे वाली मैया प्रकट हुईं थी….
यह कहानी शायद चौदहवीं शताब्दी की है. कहते हैं उस समय मनन सिंह हथुआ के राजा थे. एक बार भयंकर अकाल पड़ा. जनता त्राहि-त्राहि करने लगी. लोग मरने लगे. पर जिद्दी राजा ने कर लेना नहीं छोड़ा. …….. उधर माँ दुर्गा आद्याशक्ति के भक्त हरखु ( रहषु ) ने माँ से प्रार्थना की जिससे लोगों का दुःख दूर हो सके. सप्त सिंहों पर सवार माँ ने हरखु ( रहषु ) भगत को दर्शन दिया …. और कहा कि एक स्थानीय घास ले कर रोज़ रात में बाघों से उनकी ‘दवरी’ कराये…. हरखु ( रहषु ) भगत ऐसा करने लगे… और उनके पास अन्न का भण्डार होने लगा… जिसे वे प्रतिदिन जनता में निःशुल्क वितरित कर देते. ( यह भारत की महान आध्यात्मिक संस्कृति है …. आधुनिक उपभोक्तावाद नहीं … अन्यथा निःशुल्क वितरण करने के बजाए जनता का शोषण और जमाखोरी कर के धन बटोरने की इच्छा पहले उत्पन्न हुई रहती. कम से कम मीडिया में ब्रेकिंग न्यूज़ तो जरूर बनता !)
खबर फैलते देर न लगी. भला बाघ कैसे आतें हैं हरखु ( रहषु ) भगत के पास ? ! और आतें भी हैं तो उन्हें मार कर खा क्यों नहीं जाते ? ! पर वे तो घास की ‘ दवरी ‘ कर के अन्न पैदा करतें हैं !! ….बात राजा तक पहुँची. “यह सब हरखु ( रहषु ) का ढोंग- ढकोसला है”, राजा ने कहा. “बुलाओ, अभी दण्ड देता हूँ”.
हरखु ( रहषु ) भगत आये. राजा ने कहा: ” अगर सचमुच कोई देवी हैं तो मुझे अभी दिखाओ, अन्यथा ये पाखण्ड बन्द करो. और अगर मेरी बात नहीं मानी तो प्राणदण्ड दे दूंगा.”
राजा जिद्दी था. जैसे आज के शासक होतें हैं. हरखु ( रहषु ) भगत ने बहुत समझाया. ” राजा, देवी पर अविश्वाश मत करो. उनकी कृपा से जनता को अन्न मिल रहा है, उनके प्राण बच रहें हैं… बचने दो. इसमें तुम्हारा क्या नुकसान है ?”
पर राजा का घमण्ड सातवें आसमान पर था. उसे लगा उस से श्रेष्ठ कोई कैसे हो सकता है. हरखु ( रहषु ) भगत ने कई बार समझाया. ” राजा, अगर तुम यह गलत कर्म करोगे तो तुम्हारा नाश हो जायेगा, और देवी का दर्शन कराने के लिए मुझे भी जो अपार शक्ति व्यय करनी पड़ेगी उस से मेरा भी अहित होगा क्योंकि आध्यात्मिक शक्तियाँ प्रदर्शन के लिए नहीं होतीं. उनका प्रयोग सिर्फ भलाई के लिए करना चाहिए.”
पर आखिर राजा ने भोले-भाले हरखु ( रहषु ) भगत को बाध्य कर दिया. अत्यंत अनिच्छा से हरखु ( रहषु ) भगत ने समाधि लगाई. परमाशक्ति माँ दुर्गा का आवाहन किया… भौतिक रूप में दर्शन देने के लिए ! यह थावे की प्रसिद्द कहानी है कि हरखु ( रहषु ) भगत के आवाहन पर जगज्जननी मातृ शक्ति दुर्गा असम के कामाख्या शक्तिपीठ से निकल पड़ीं थावे आने के लिए !
[ Actually, the Sanskrit मातृ -'Matri' (meaning mother), Latin ''Maeter" & English ‘Mother’ and are related. Thus, the term 'material' is from the term 'motherial'. What is called मातृक जगत-"Matrik Jagat" , i.e. World of Mother (or made up of mother) in Vedic parlance is called 'Material World' in English !!
In Vedic parlance, the physical world is मातृक जगत-'Matrik Jagat' (Motherial World) becuase the NATURE ( प्रकृति-'Prakriti') is referred to as the MOTHER FORCE with her own consciousness. NATURE is A SINGLE WHOLE. The cosmos is ONE organic WHOLE.]
इसी मातृ शक्ति का हरखु ( रहषु ) भगत ने आवाहन किया देवी के रूप में प्रकट होने के लिए.
कामाख्या से देवी चलीं. रास्ते में पटना में पटन-देवी के रूप में प्रकट हुईं. फिर विंध्याचल और आमी में प्रकट होते हुए थावे आयीं. इन स्थानों पर भी शक्तिपीठ हैं.
कामाख्या से थावे के इस यात्रा- वृत्तान्त को मैं एक प्रतीकात्मक कथ्य मानता हूँ. यह मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक शक्ति के जागरण का वृत्तान्त है.
हमारा पूरा शरीर सात चक्रों के साँचे पर बुना गया है. मूलाधार चक्र सबसे निचला चक्र है. It is the seat of basic instincts, near the base of the spine. यहाँ व्यक्तिगत “मैं” ( “मैं” का वह बोध जो अपने शरीर तक सीमित रहता है) का बोध है. The sense of “I am”. Muladhar Chakra is the seat of this very Individual ‘I’ consciousness.
मस्तक के उपरी भाग में सहस्रार चक्र है. The seat of highest instincts & consciouness. चेतना का सर्वोच्च स्थान. यहाँ जो “मैं” का बोध है वह समस्त सृष्टि के साथ एकात्म है. यहाँ तक जिसकी चेतना जागृत है उसके “मैं” के बोध में सभी जीव, जड़- चेतन सभी पदार्थ आतें हैं. वह किसी भी दूसरे व्यक्ति, जीव या पदार्थ से अपने को अलग नहीं पाता. This sahasrar chakra is, thus, the seat of Universal ‘I’ consciousness. If our consciousness gets awakened upto this level, our sense & feeling of ‘I’ includes the entire creation, the entire cosmos. This force is referred to as Mother Goddess (or by so many other names). Mother Force’s true form is revealed only at the Sahasrar Chakra.
सहस्रार चक्र पर ही देवी का सही रूप दिखाई देता है.

तो देवी के कामाख्या से थावे के इस यात्रा- वृत्तान्त का यही वास्तविक अर्थ है: यह कि हरखु ( रहषु ) भगत ने साधना से, भक्ति से अपनी कुण्डलिनी शक्ति ( Force of Consciouness) को मूलाधार चक्र से जगाकर सहस्रार चक्र तक पहुँचा दिया था. फिर, उसी शक्ति के सहारे माँ के भौतिक रूप का दर्शन करवाया राजा को. प्रतीकात्मक रूप से इसी को हरखु ( रहषु ) के मस्तक से देवी की कंगन से सजी कलाई निकलना कह के वर्णित किया गया है.
चेतना का जागरण ही जीवन में वास्तविक विकास है. मूलाधार से चेतना को उठाकर सहस्रार तक पहुँचना ही मनुष्य जीवन का ध्येय है. भगवान् बुद्ध को यही उपलब्धि हुई थी. Awakening of ‘I’ consciousness from individual level to the universal is called development, and is the prime aim of human life. Lord Buddha is a great example of this. संयोग से, बुद्ध का निर्वाण -स्थल कुशीनगर थावे से डेढ़- दो घण्टे की दूरी पर ही है.
[ थावे एक रेल - जंक्शन है और अब एक नया रेल-मण्डल भी बनने जा रहा है. पर रेल मुख्य-मार्ग पर निकटतम स्टेशन सिवान ही है. निकटतम एयरपोर्ट पटना है. वैसे पास के गोरखपुर में भी दिल्ली से कुछ दिन विमान आतें हैं. ठहरने के लिए सबसे करीब होटल हैं 9 किमी की दूरी पर गोपालगंज में. मुख्य होटल हैं- वैभव, आशीष, यात्री और कैलाश. साफ़, सुन्दर और सारी आधुनिक सुविधाओं से युक्त.]
थावे पर एक सुन्दर वेबसाईट भी है. http://www.jaimaathawewali.com
यह देवी-भक्त श्री अजीत तिवारी के मेहनत का परिणाम है. जो फोटो आप यहाँ देख रहें हैं उसमे से कई आप इस वेबसाईट पर भी देख सकते हैं : http://www.jaimaathawewali.com/photo_gallery.php
अजीत जी की लगन देख कर ही मैंने उन्हें ये फोटोग्राफ्स दिए.
एक फिल्म-निर्देशक के रूप में थावे मैया पर एक फीचर फिल्म बनाने की मेरी एक योजना है.
…… चैत्र नवरात्रि प्रथम दिन ( 27 मार्च 2009) की मेरी इस थावे यात्रा के फोटोग्राफ्स ही यहाँ आप देख रहें हैं. …………
या देवी सर्व भूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
( Oh Devi, thou who resides in the form of energy in all beings, I bow to thee, I bow to thee, I bow to thee.)

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